सुना है एक महात्मा के पास एक बार एक डाकू आया और बोलाः
"महाराज ! मैं यहाँ, आपके सत्संग में बैठ सकता हूँ ?"
महात्मा ने कहाः "हाँ।"
डाकू ने कहाः "महाराज ! मैं चंबल की
घाटी का हूँ।"
महात्मा ने कहाः "कोई बात नहीं।"
"मैं दारू पीता हूँ।"
"कोई बात नहीं।"
"मैं जुआ भी खेलता हूँ।"
"कोई बात नहीं।"
"मैं वेश्यागामी भी हूँ।"
महात्मा ने कहाः "कोई बात नहीं।"
"मैं झगड़ाखोर भी हूँ।"
"कोई बात नहीं।"
"मैं अफीम भी खाता हूँ।"
"कोई बात नहीं।"
"महाराज ! मुझमें सब बुराइयाँ हैं।"
"कोई बात नहीं।"
"महाराज ! आप मुझे स्वीकार कर रहे हैं।"
महात्मा ने कहाः "हाँ।"
उसने पूछाः "ऐसा क्यों।"
महात्मा ने कहाः "अरे, परमात्मा जब अपनी दुनिया से
तुम्हें नहीं निकालता है तो मैं अपने मंडप या आश्रम
से तुम्हें क्यों निकालूँ !
वह भी तेरे सुधरने का इन्तजार कर रहा है तो मैं क्यूँ अपना धैर्य खोऊँ ?
जब उसकी हाँ है तभी तो तू यहाँ पहुँचा है फिर मैं ना क्यों बोलूँ ?
उसकी हाँ में मेरी हाँ है तो तू ना क्यों करता है ?
तू भी बैठ जा !"
"महाराज ! मैं यहाँ, आपके सत्संग में बैठ सकता हूँ ?"
महात्मा ने कहाः "हाँ।"
डाकू ने कहाः "महाराज ! मैं चंबल की
घाटी का हूँ।"
महात्मा ने कहाः "कोई बात नहीं।"
"मैं दारू पीता हूँ।"
"कोई बात नहीं।"
"मैं जुआ भी खेलता हूँ।"
"कोई बात नहीं।"
"मैं वेश्यागामी भी हूँ।"
महात्मा ने कहाः "कोई बात नहीं।"
"मैं झगड़ाखोर भी हूँ।"
"कोई बात नहीं।"
"मैं अफीम भी खाता हूँ।"
"कोई बात नहीं।"
"महाराज ! मुझमें सब बुराइयाँ हैं।"
"कोई बात नहीं।"
"महाराज ! आप मुझे स्वीकार कर रहे हैं।"
महात्मा ने कहाः "हाँ।"
उसने पूछाः "ऐसा क्यों।"
महात्मा ने कहाः "अरे, परमात्मा जब अपनी दुनिया से
तुम्हें नहीं निकालता है तो मैं अपने मंडप या आश्रम
से तुम्हें क्यों निकालूँ !
वह भी तेरे सुधरने का इन्तजार कर रहा है तो मैं क्यूँ अपना धैर्य खोऊँ ?
जब उसकी हाँ है तभी तो तू यहाँ पहुँचा है फिर मैं ना क्यों बोलूँ ?
उसकी हाँ में मेरी हाँ है तो तू ना क्यों करता है ?
तू भी बैठ जा !"
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