सती मदालसा के चार पुत्र थे...सब को पालने में ही " अद्वैतवाद" पिलाया था,,
एक पुत्र का नाम "अलर्क" उसे माँ मदालसा ने एक पत्रिका दे रखी थी ..
लिखा था...."जब मुसीबत की पल आये...अकेला महसूस होए ..तब ये पढना.."
अलर्क को अपना राज्यधर्म निभाते....जब कठीन समय का सामना करना पड़ा.
अलर्क ने माँ मदालसा की वो पत्रिका निकलकर पढ़ी.......
सह्याद्री पर्वत पर बिराजमान गुरु दत्तात्रेयजी के पास जाकर बोध लेने को लिखा था...
राजा अलर्क गुरु दत्तात्रेय जी के पास पहुंचे....और जो बोध प्राप्त किया....
दत्तकृपा से ही राजा अलर्क के माता के दिए संस्कार जाग उठे....
किसी से ना मान ना अपमान...ना राग ..ना द्वेष...
ना स्वार्थ ...ना अभिमान ..सब समज गया
राजा अलर्क भगवान दत्त के आशीर्वाद से ही ...उसको दगा करनेवालों को माफ़ कर शके !
सुकून से अपना राज्यधर्म निभाते प्रजा/पडोशी राज्यों सबका कल्याण करते रहे
समय आने पर दृढ़ वैराग्य से अपना सबकुछ छोड़कर...
अपने प्रतिभावान प्रतापीपुत्र के हाथ में राज्य की डोर सोंप दी !
( पपू.रंग अवधूत जी - श्रीगुरुलीलामृत )
अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त_/\_
मातृदेवो भव_/\_
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