गजल:-
दूर रहे वो मगर , रफ्ता रफ्ता पास आते चले गए ;
गम के समंदर मे हम मुस्कराते चले गए ।
फैल गई ये बात दूर तलक कि हम हँसते रहते है ,
और ये तो हमें पता था , कितने गम छुपाते चले गए ।
किस्मत मे नही थी वो और हम भी बदनसीब थे ,
ये पता होते हुए भी हम किस्मत आजमाते चले गए ।
वो तो तोड़ती रही मेरे वादोँ को कच्चे धागोँ जैसे यारोँ ,
और हम पागलोँ जैसे थे , हर वफ़ा निभाते चले गए ।
मत पूछो , बहुत खुश थी वो मेरे ज़ज्बातोँ से खेलकर ,
और हम रिश्ते बचाते-बचाते अश्क बहाते चले गए ॥
राजेश कान्धवे
दूर रहे वो मगर , रफ्ता रफ्ता पास आते चले गए ;
गम के समंदर मे हम मुस्कराते चले गए ।
फैल गई ये बात दूर तलक कि हम हँसते रहते है ,
और ये तो हमें पता था , कितने गम छुपाते चले गए ।
किस्मत मे नही थी वो और हम भी बदनसीब थे ,
ये पता होते हुए भी हम किस्मत आजमाते चले गए ।
वो तो तोड़ती रही मेरे वादोँ को कच्चे धागोँ जैसे यारोँ ,
और हम पागलोँ जैसे थे , हर वफ़ा निभाते चले गए ।
मत पूछो , बहुत खुश थी वो मेरे ज़ज्बातोँ से खेलकर ,
और हम रिश्ते बचाते-बचाते अश्क बहाते चले गए ॥
राजेश कान्धवे
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