भगवान श्रीकृष्ण भोजन करने बैठे तो रुकमणी जी पंखा झलने लगीँ।
भगवान ने जैसे
ही पहला निवाला उठाया लेकिन जाने क्या हुआ
कि निवाला थाली मेँ डालकर बहुत तेजी से
बाहर भागे।
रुकमणी जी अवाक...!
फिर वे दरवाजे के पास जाकर रुक गये और मुस्कराते
हुये वापस
होकर पुनः भोजन करने लगे।
रुकमणी जी ने पूछा- "ये एकाएक क्या हो गया था स्वामी?"
भगवान वासुदेव बोले- "मेरे एक परम भक्त पर कुछ लोग
पागल
समझकर पत्थर बरसा रहे थे और वह हँसता हुआ सिर्फ
मेरा नाम ले रहा था। मैँ उसी को बचाने भागा था।"
रुकमणी जी ने पुनः सवाल किया- "फिर
आप लौट क्योँ आये?"
‪#‎भगवान‬ ने समझाया- "क्योँकि उसने तब तक
मेरा भरोसा छोड़कर
अपनी रक्षा के लिये स्वयं पत्थर उठा चुका था।"
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"ताज्जूब होता है कि ईश्वर
इतनी सारी भीड़ में भी मुझे नही भूलता
और मेरा तो एक ईश्वर है
फिर भी मैं उसे भूल जाता हूँ।"
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आज वाकई ये दोहा अपने शाब्दिक रूप में चरितार्थ हो रहा है
"गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागूं पाँय"
‪#‎टीचर्स_डे‬ और ‪#‎जन्माष्टमी‬ एक ही दिन है..
जय जय श्री कृष्‍ण
जय हो गुरु जी
जय हो मेरे श्याम श्री
कृष्ण
जन्माष्टमी पर आपको और आपके परिवार को बधाई और हार्दिक शुभकामनाएं l
"नन्द के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की...
हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की!"
-: जय श्री कृष्णा :-
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