ग़ज़ल gazal

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मैंने बहारों को इशारों से बुलाया है..
रूठे थे , बड़ी सिद्दत से मनाया है।

खिलखिला कर हँस पड़ी कलियाँ..
बेताब भँवरों ने सीने से लगाया है।


तुम आओ और मेरी नज़रों से देखो..
चाँद शाम की दहलीज़ पे आया है।




हकीक़त की खूबसूरती क्या बयां कर दी हमने
वो ख़्वाबों से निकल कर हकीक़त में आ गए

मुद्दतों से आरज़ू रही उनके करीब आने की
नजदीकियां जब भी आयीं फासले बन गए

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