घटित इतिहासिक घटना -

ताज खाँ की भक्ति

मंदिर में फिर से जाना है और मनमोहन के दर्शन करने है ऐसा विचार आये । वह चला तो आया घर पर पिछे अपना प्रियतम जैसे छूट गया हो । वह पलटकर देखे पर मंदिर कि खि‹डकी बंद हो गयी थी । ताजखा का हृदय शुद्ध था । शुद्ध हृदय में वह आकर विराजमान हो ही जाता है । मदनमोहन उसके हृदय में विराजमान हो गये Ÿ। ताजखा सोचता रहता क्या सुंदर छवी है ! उठते-बैठते वही छवी ताजखा के हृदय पर अंकित हो गयी । उनको फिर से देखने की इच्छा हुयी Ÿ। एक बार फिर ताजखा दो‹डी पर चले गये । बाहर किसी सेवक से कहा : मुझे फिर से वह खि‹डकी खोल दे न ! एक बार फिर से झलक करवा दे Ÿ। मैं चुप-चाप देखकर चला जाऊँगा । गोस्वामी को पता चला, मंदिर के पूजारी को पता चला, सबने मिलकर उसे धक्के मारकर निकाल दिये । ताजखा के आँख से आँसू निकले । हिन्दू तुझे भगवान कहतहैंै । मुसलमान तुझे अल्ला कहते हैं । स्वरूप तो सभी ता एक है Ÿ। पर इतना त‹डपाना क्या तुझे जरूरी है ? मैं मुसलमान हूँ क्या सिर्फ इसलिये तेरा दर्शन नहीं कर सकता ? तेरी कुदरत भी जात-पात नहीं देखती Ÿ। qहदू हो या मुसलिम हो , नदी भी दोनों को समान जल पीलाती है Ÿ। उसको बनानेवाला तू कब से जाती-वादि हो गया ? आँखो से टप-टप आँसू बह रहे हैं । मेरे परमात्मा मैंने तुझे जी भरकर देखा भी नहीं और मेरा मन तो तेरे पास ही छूट गया । शुद्ध हृदय था । रोते-रोते ताजखा सो गया Ÿ। दूसरे दिन उठे आँखे वही गिली-कि-गिली थी । भोजन अंदर ना जाये । भूखे रहते तीन दिन हो गये ताजखा को । यह नही कि केवल ताजखा को बेचैनी थी भगवान से मिलने की Ÿ। मदनमोहन को ताजखा से कई अधिक बेचैनी थी, ताजखा से मिलने की Ÿ। रातको मंदिर के पूजारी ने अमनिया का धाल रखा भगवान के पलंग के निचे Ÿ। की कभी भी भगवान को भूक लगे तो खा ले Ÿ। आज भी मंदिरो में माखन-मिश्री रखकर पूजारी मंदिर के दरवाजे बंद करते हैं । अमनिया का धाल लेकर मदनमोहन ने सेवक का वेश बनाया और र्निदोश ताजखा के पास चले गये Ÿ। दरवाजा खटखटाया, ताजखा ने पूछा : कौन ? आवाज आई : दरवाजा खोलो मैं मंदिर से आया हूँ Ÿ। मंदिर का नाम सुनते ही ताजखा की आँखे चमक गयी Ÿ। ख‹डे हुये दरवाजा खोला देखा मंदिर का तहलुआ हाथ में थाल लिये आया है Ÿ। थाल कैसा ? सोने का धाल, रत्नो से ज‹डा हुआ, उसमें प्रसाद प‹डा हुआ Ÿ। तहलुआ ने कहा : सुनो ताजखा ! यह प्रसाद गोस्वामीजी ने भेजा है और कहलवाया है,Ÿ सुबह जब भोग की आरती लगेगी तब ताजखा को कह दो दर्शन करने आ जाय मेरे दरवाजे खुले है Ÿ। ताजखा को विश्वास न हुआ Ÿ। ताजखा ने कहा : दो दिन पहले जब मैं दो‹डी तक आया था, तब उन्होंने मुझे धक्के मारकर निकाल दिया था Ÿ। वे मझे मंदिर में आने को नहीं कह सकते Ÿ। तहलुआ ने हाथ जो‹डकर कहा : तुम जरूर आना Ÿ। कहाँ तो भगवान के सब हाथ जो‹डते है और कहाँ भगवान भक्त के हाथ जो‹ड रहा है Ÿ। तहलुआ कहता है : तुम्हें गोस्वामीजी ने ही बुलाया है Ÿ। कुछ नहीं कहेगे वे तुम्हें Ÿ। तुम्हे अगर विश्वास न आये तो यह देखो थाल Ÿ। यह भगवान के मंदिर में पलंग के निचे का रखा हुआ थाल है Ÿ। बिना गोस्वामीजी के आज्ञा से, मैं इसे कैसे ला सकता हूँ ? गोस्वामीजी सुबह की आरती में तुम्हारा इंतजार करेंगे Ÿ। नाम गोस्वामी का ले रहा है पर इंतजार किसका है ? उस मदनमोहन का Ÿ। भगवान कहता है भक्त से मैं तेरा इंतजार करूँगा Ÿ। ताजखा में आनंद की लहर दौ‹ड गयी Ÿ। जाते हुये तहलुये ने पिछे देखा Ÿ। जैसे मंदिर की दियो‹डी से जाते हुये ताजखा को लगा मेरा कोई पिछे छुट रहा है Ÿ। ऐसे ही अब भगवान भक्त केघर से जोते हुये लग रहा है कि मेरा कोई पिछे छुट रहा है Ÿ। अब सुबह का इंतजार कैसे हो ? कैसे यह पूरी रात कटेगी Ÿ? दिन की पहली किरन से पहले मैं कब उस तक पहुँच जाऊँ, जहाँ गोस्वामीजी मंदिर का दरवाजा खोलकर मुझे मदनमोहन की सुंदर छवी का दर्शन करवायेगे Ÿ। ताजखा मंदिर में दर्शन का इंतजार कर रहा है पर यह ताजखा को क्या पता कि इतनी प्रतिक्षा भी उस भगवान को न हुई कि वह रूप बदलकर भी उसे दर्शन देने आ गये Ÿ। इतना इंतजार भी उससे न हुआ Ÿ। उसी रात को वहा गोस्वामीजी को सपना आया : तुने मेरे एक भक्त का अपमान किया है Ÿ। तूने जातिवाद को प्रोतसाहन दिया Ÿ। जहाँ भक्ति है, वहाँ जाति नहीं देखी जाती Ÿ।ैं अमनिया का धाल जो मेरे पलंग के निचे तुमने रखा था, मैं उस थाल को ताजखा को दे आया हूँ Ÿ। वह कल सुबह आयेगा Ÿ। उसे दर्शन करवा देना Ÿ। गोसाँई उठते है सुबह, मंदिर में जाकर देखते है कि धाल तो है ही नहीं Ÿ। इसका मतलब मुझे ठीक सपना आया था Ÿ। पूजारी मंदिर में आकर देखता है तो धाल नहीं है Ÿ। पूजारी दौडकर गोसाँई के पास जाता है Ÿकि मंदिर में चोरी हो गयी Ÿ। गोसाँई कहते है : मुझे पता है Ÿ। चोर ने अपनी चोरी स्विकार कर ली Ÿ। पूजारी को भेज दिया Ÿ। गोसाँई ने सपने की बात करोली के महाराज को बताई Ÿ। इधर ताजखा निकला है मंदिर की ओर Ÿ। उसके मन में विचार आने लगे Ÿ। गोसाँई ने तो धक्के मारकर निकाल दिया था Ÿ। कहीं वह चोर े तो नहीं था जो कल मुझे धाल देकर गया Ÿ। जिससे चोरी का इल्जाम मुझपर आ जाय Ÿ। जिन गोसाँई ने धक्के मारे उन्हें अचानक तो क्या हुआ कि मुझे बुलावा भेजा ? उस तहलुये को तो मैंने कभी देखा भी नहीं Ÿ। वह चोर ही होगा Ÿ। भिन्न विचार दिमाक में गुमने लगे Ÿ। आखिर धीरे- धीरे ताजखा मंदिर की ओर कदम रखने लगा Ÿ। सोचा धाल तो वापिस करना ही है Ÿतो होगा देखा जायेगा Ÿ। जाते है तो क्या देखते है ? कि जिस दिय‹डी से निकाले गये थे, उसी दिय‹डी पर एक ओर करेली के महाराज और दूसरी ओर गोसाँई ख‹डे है इंतजार कर रहे है, किसका ? ताजखा का Ÿ। ताजखा काँपने लगा कि जरूर मुझे सजा देने के लिये ही महाराज आये होगे Ÿ। धर-धर काँपते हुये, हाथों में धाल लिये ताजखा आगे ब‹डकर कहते है : गोसाँई यह थाल...गोसाँई ने हाथ का इशारा किया, मुझे पता है Ÿ। गोसाँई ने ताजखा के पैर प‹डे Ÿ। महाराज ने ताजखा के गला लगाया, ऐसे भक्त का दर्शन करना मेरे लिये पून्य की बात है Ÿ। ताजखा ने कहा : गोसाँईजी अपने मुझे बुलाया ? रातको तहलुआ आया था, यह थाल देने । वह तहलुआ कहा है ?गोसाँई ने मंदिर की ओर इशारा करते हुये कहा : यही तेरा तहलुआ है जो मंदिर के सिंहासन पर विराजमान है । देवी-देवता, समस्त संसार इसके तहलुये है, यह कब तहलुआ था ? पर यह भक्तवत्सल भगवान भक्तों की सेवा में होता है Ÿ। ताजखा यह स्वयं भगवान थे जो कल तुम्हें दर्शन देने आये थे । ताजखा की आँखो से आँसू बहने लगे टप-टप । हे भगवान तूने मेरे लिये तहलुये का भेष बनाया Ÿ। मेरे लिये तुझे आधी रातको धाल की चोरी करनी प‹डी । मेरे लिये गोसाँई को सपना दिया । तू कैसा भक्तवत्सल है ? यदि संसार उसके प्रेम में घुम नहीं होता तो धिक्कार है संसार को । ताजखा ने इसके बाद बहुत उँचे पथ गाये है । ब‹डे उँचे भक्त हो गये ताजखा । मुसलमान थे पर भक्ति कहाँ जात-पात देखती है ? ऐसे ताजखा जैसे महापूरुष का अनुकरण हमारे जीवन में भी हो जाय ।
Reviewed by Unknown on 00:24 Rating: 5

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