न ऐसी मंजिलें होतीं, न ऐसा रास्ता होता,
संभल कर हम ज़रा चलते तो आलम ज़ेरे-पा होता;
घटा छाती, बहार आती, तुम्हारा तज़किरा होता,
फिर उसके बाद गुल खिलते कि ज़ख़्मे-दिल हरा होता;
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